संसद के बजट सत्र के समापन के साथ ही 16वीं लोकसभा का कार्यकाल पूरा हो गया। अगले महीने आम चुनाव की घोषणा होगी और मई में 17वीं लोकसभा का गठन होगा। 16वीं लोकसभा की इस अंतिम बैठक के अंतिम दिन सत्तारूढ़ बीजेपी और विपक्ष ने आम चुनाव को लेकर अपनी-अपनी पोजिशनिंग भी की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में साफ कर दिया कि बीजेपी का मुख्य चुनावी सूत्र क्या होगा। बीजेपी जनता से पूर्ण बहुमत वाली एक ताकतवर सरकार बनाने के लिए वोट मांगेगी। पीएम मोदी ने कहा कि ‘लोग कहते हैं, मोदी और सुषमा जी के कार्यकाल में दुनिया में भारत की इज्जत बढ़ी है। जबकि इसका कारण मोदी और सुषमा जी नहीं हैं। दुनिया में भारत की इज्जत बढ़ी है क्योंकि यहां पूर्ण बहुमत वाली सरकार है। 

पूर्ण बहुमत वाली सरकार का दुनिया में असर ज्यादा होता है। उसका यश मोदी और सुषमा जी को नहीं जाता है, बल्कि 2014 के जनता के निर्णय को जाता है।’ उन्होंने इशारों में कह दिया कि गठबंधन वाली सरकार, यानी बहुत सी राजनीतिक धाराओं को साथ लेकर चलने वाला सियासी प्रयोग सफल नहीं होता और वह विकास में बाधक भी होता है। विपक्ष के महागठबंधन पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि स्वस्थ समाज महामिलावट से दूर रहता है और मजबूत लोकतंत्र में भरोसा करता है। जाहिर है, मजबूत सरकार से उनका आशय अपने व्यक्तिगत करिश्मे पर टिकी सरकार से भी है। उन्होंने विपक्ष में से चुनकर जिस तरह सिर्फ राहुल गांधी का नाम लिया और उन पर तंज कसे, उससे लगता है कि लोकसभा चुनाव को वह ‘राहुल बनाम मोदी’ पर ही केंद्रित करना चाहते हैं। दूसरी तरफ विपक्ष ने भी इसी दिन न सिर्फ अपने इरादे जाहिर कर दिए, बल्कि अपनी रणनीति को लेकर एक अहम संकेत भी दे दिया। विपक्षी नेताओं ने पहले दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की रैली में, फिर एनसीपी नेता शरद पवार के घर पर एकजुटता दिखाई। वहां चली बैठक में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के अलावा पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, आंध्र प्रदेश के सीएम चंद्रबाबू नायडू, जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारुक अब्दुल्ला और अरविंद केजरीवाल उपस्थित थे। राहुल गांधी और शरद पवार ने कॉमन मिनिमम प्रोग्राम बनाकर चुनाव लड़ने की बात कही। चुनावी तालमेल को लेकर कई बातें अभी अस्पष्ट हैं, लेकिन बड़े नेताओं के रुख से लगता है कि उनका चुनाव पूर्व गठबंधन कोई दूर की कौड़ी नहीं है। विपक्ष का जोर क्षेत्रीय दलों को साथ लेकर चलने, संघवाद पर बल देने, विभिन्न संस्थाओं की स्वायत्तता बहाल करने और समाज के कमजोर वर्गों को सशक्त बनाने पर है। इस तरह वोटरों के सामने इस बार चुनने के लिए स्पष्ट तौर पर दो अवधारणाएं होंगी। एक तरफ एक नेता, एक दल के वर्चस्व और मजबूत केंद्र की पक्षधरता वाला विचार और दूसरी तरफ विकेंद्रीकरण समर्थक, अलग-अलग सामाजिक धाराओं को जोड़कर चलने वाली समावेशी सोच। देखना है, चुनाव में जनता किसे अपनाती है।

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