कश्मीर में कठिन काम

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कश्मीर में आतंकियों के खिलाफ सख्ती के साथ उस मानसिकता, माहौल को बदलने की जरूरत, जिसके चलते युवा आतंकवाद के रास्ते पर जा रहे हैं।

जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने आतंकवाद का गढ़ माने जाने वाले बारामुला जिले के स्थानीय आतंकियों से मुक्त हो जाने पर पुलिस और सुरक्षा बलों की सराहना करते हुए यह सही कहा कि आतंकियों को मारना समस्या का हल नहीं। नि:संदेह इसका यह मतलब नहीं निकाला जाना चाहिए कि आतंकियों के खिलाफ जारी अभियान बंद हो जाने चाहिए। हथियार उठाने वालों के खिलाफ न केवल सख्ती दिखानी होगी, बल्कि उन्हें यह संदेश भी देना होगा कि बंदूक के इस्तेमाल को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, लेकिन इसी के साथ उस मानसिकता और माहौल को बदलने की भी जरूरत है, जिसके चलते कश्मीर घाटी के युवा हथियार उठाकर आतंकवाद के रास्ते पर जा रहे हैं। हथियार उठाने वालों में ज्यादातर वे हैं जिनके दिमाग में यह भरा जा रहा है कि कश्मीर को आजादी की जरूरत है और वह बंदूक उठाने से मिल सकती है। चूंकि कश्मीर का विषाक्त माहौल वहां के युवाओं में यह जहर भर रहा है कि कश्मीरी सताए जा रहे हैं, इसी कारण वहां से ऐसी खबरें आती रहती हैं कि छात्र आतंकी बना या युवक ने हथियार उठाए। यह खबर चंद दिनों पहले की ही है कि शोपियां में मारा गया आतंकी भारतीय पुलिस सेवा के एक अफसर का भाई था और वह मेडिकल की पढ़ाई छोड़कर आतंक के रास्ते पर गया था।

कश्मीर के माहौल को विषाक्त बनाने में एक बड़ी भूमिका पाकिस्तान और उसके इशारे पर काम करने वाले अलगाववादी संगठनों की है, लेकिन केवल पाकिस्तान को दोष देते रहने से बात बनने वाली नहीं है, क्योंकि कश्मीर में कई संगठन आतंकवाद का ही कारोबार कर रहे हैं। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि घाटी में असर रखने वाले जिन राजनीतिक दलों को कश्मीर का माहौल बदलने में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए, वे ऐसा करने से बच रहे हैं। ये दल सत्ता में रहते समय अलग भाषा बोलते हैं और विपक्ष में रहते समय अलग। यह एक सच्चाई है कि भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाने और चलाने वाली पीडीपी की महबूबा मुफ्ती इन दिनों मारे गए आतंकियों के परिवारों की मातमपुर्सी करने में लगी हुई हैं। स्पष्ट है कि राजनीतिक दलों का ऐसा रवैया भारत सरकार की माहौल बदलने वाली पहल को आगे नहीं बढ़ने दे रहा है। बावजूद इसके कश्मीर में आतंकवाद को खाद-पानी देने वाली विचारधारा की काट करने के ठोस उपाय करने ही होंगे। सुरक्षा बल राज्य और केंद्र सरकार की माहौल एवं मानसिकता बदलने वाली पहल का हिस्सा अवश्य हो सकते हैं, लेकिन वे यह काम केवल अपने बलबूते नहीं कर सकते। यह अच्छा है कि जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल ने साफ तौर पर कहा कि आतंकवाद बंदूक में नहीं, दिमाग में है, लेकिन सच को बयान करना भर पर्याप्त नहीं। अब जब आतंकियों को मुख्यधारा में लाने और उनके पुनर्वास की योजना बनाने पर विचार हो रहा है, तब यह ध्यान रखा जाए तो बेहतर कि यह आसान काम नहीं।

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